झारखण्ड मे प्रकृति की पूजा करने वाला आदिवासी समाज के लिए मकर संक्रांति एक बड़ा पर्व है। इस पर्व को मनाने के लिए ग्रामीण एक माह पूर्व से ही तैयारी करना शुरु कर कर देते है। घरों मे तरह तरह के व्यंजन बनाये जाते है वहीं मकर के दूसरे दिन को अखंड जातरा कहा जाता है जिसमे चीख और दर्द भरी परम्परा को निभाते है। जिसमे 21 दिन के नवजात बच्चे से लेकर बड़े तक को गर्म सीक से पेट मे दागा जाता है जिसे चिड़ी दाग़ कहा जाता है।

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आदिवासी समाज मे मकर के दूसरे दिन को अखंड जातरा कहते है।इस दिन गांव मे अलग अलग इलाके मे अहले सुबह पुरोहित के घर आस पास की महिलाएं गोद मे अपने बच्चे को लेकर पहुंचती है। पुरोहित के घर के आँगन मे लकड़ी की आग मे पुरोहित पतली ताम्बे की सिक को गर्म कर उसे तपाता है।

महिलाएं अपने बच्चे को पुरोहित के हवाले कर देती है। पुरोहित महिला से उसके गांव का पता बच्चे का नाम पूछकर ध्यान लगाकर पूजा करता है और वहीं मिट्टी की ज़मीन पर सरसो तेल से एक दाग़ देता है और फिर बच्चे के पेट के नाभि के चारो तरफ तेल लगाकर तपते ताम्बे की सिक से नाभि के चारो तरफ चार बार दागता है। इस दौरान पुरे माहौल मे चीख गूंजती है लेकिन पुरोहित बच्चे के सर पर हाथ रख उसे आशीर्वाद देता है और उसकी माँ को सौंप देता है।

पुरोहित बताते है की यह उनकी पुरानी परम्परा है उनके परदादा दादा पिता के बाद आज वो इसे निभा रहे है।

यह माना जाता है की मकर मे कई तरह के व्यंजन खाने के बाद पेट दर्द या तबियत खराब हो जाता है चिड़ी दाग़ देने से ऊपर से नस का इलाज होता है। और पेट दर्द सब ठीक हो जाता है। 21दिन के नवजात बच्चे से लेकर बड़े बुजुर्ग भी चिड़ी दाग़ लेते है।

बच्चे को चिड़ी दाग़ देने के बाद माँ को इस बात की ख़ुशी होती है की उसके बच्चे को अब पेट से सम्बन्धित कोई तकलीफ नहीं होगी वो अपने बच्चे को गोद मे लेकर ख़ुशी ख़ुशी लौट जाती है।

महिलाओं का कहना है हम अपनी इस पुरानी परम्परा को मानते है बच्चा रोता है लेकिन वो थोड़ी देर बाद शांत हो जाएगा।


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